हिंदी से डर या हिंदी को डर: एक आत्ममंथन
भूमिका:
हिंदी, जो हमारे देश की आत्मा है, आज कहीं खोती हुई नजर आ रही है। जिस भाषा ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम को आवाज दी, जो हमारी संस्कृति और सभ्यता का आधार है, वह आज खुद को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। सवाल उठता है, क्या हम हिंदी से डरते हैं या हिंदी को डर लगने लगा है?
हिंदी का अर्थ का अनर्थ: कब जागेगा हमारा स्वाभिमान?
यह कितना दुखद है कि हिंदी बोलने और समझने वाले लोग भी आज अपनी बात को समझाने के लिए अंग्रेजी का सहारा ले रहे हैं। 'अगर' 'और' जैसे शब्दों का उपयोग करने की जगह 'or' का इस्तेमाल करना हमारी भाषा के प्रति उदासीनता को दर्शाता है। परिणामस्वरूप, हिंदी केवल औपचारिक भाषणों और सरकारी कागजों तक सीमित रह गई है। आज जब AI जैसी आधुनिक प्रणाली जब हिंदी मैं कुछ लिखती है तो पूर्ण विराम की जगह एक इंग्लिश का डॉट (.) लगा देती है जो ये दर्शाता है की हम न हिंदी लिखना और सिखाना चाहते हैं और न उसमें कोई बेहतर सुधार करना चाहते हैं।
शब्दावली का कम ज्ञान हमें कैसे मोड़ पर ले आया है की हम चाचा, फूफा मामा और किसी पड़ोसी को पुकारना हो तो अंकल शब्द से ही संबोधित करना पड़ता है और हिंदी में चाचा को चाचा, फुफा को फुफा, मामा को मामा बोलकर कितना अपना पन सा लगता है मानों जैसे रिश्तों की मिठास घुल गई है, यह सिर्फ शब्दों का अनर्थ नहीं, हमारी पहचान और संस्कृति का भी अपमान है। सवाल यह है कि हम कब समझेंगे कि अपनी मातृभाषा के बिना हमारी जड़ें कमजोर हो रही हैं? हम कितने आलसी हो गये हैं, कि सोशल मीडिया पर जब अपने सामंजस्य को बढ़ाने की बात करते हैं तो उसमें भी हम हिंदी को मानो ऐसे प्रयोग करने लगें जैसे आटे में नामक , आधुनिक शिक्षा के बावजूद, जब बात हिंदी की आती है तो बड़े - बड़े शहरों में निवास करने वाले लोग इंग्लिश को सबसे ज्यादा तवज्जोह देते हैं, हमारे समाज में आधुनिकता का मतलब पश्चिमी सभ्यता को अपनाना बन गया है। भाषा, जो हमारी संस्कृति की जड़ है, उसे हमने आधुनिकता की बलि चढ़ा दिया है। अंग्रेजी बोलने वाले को हर चीज में निपुण और कुशल (स्मार्टनेस) होने का प्रतीक मान लिया गया है, जबकि हिंदी को बोलने वाले लोग कमतर समझे जाते हैं।
यदि कोई हिंदी में अपना परिचय (अभिधान) के लिए हिंदी प्रयोग करता है तो उसे कम हुनर मंद मान बैठते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है अगर हम अपने इतिहास में जाये तो देखेंगे की कितने महान साहित्य लेखक, वैज्ञानिक, और साथ में सिविल सेवक बड़े- बड़े पदों पर नियुक्त हैं।
जब कविता की बात आती है तो, जो भावनात्मक व्यंग हमें अपनी हिंदी में देखने और सुनने को मिलता है बो अंग्रेजी भाषा में नहीं मिलता, इसलिए हमें अपनी हिंदी पर गर्व होना चाहिए।
भारतीय लोग हिन्दू राष्ट्र बनाने की तो बात कर रहें हैं, मगर हिंदी भाषा के लिए क्या किया जाये अपनी संस्कृत भाषा को कैसे लोगो तक पहुँचाया जाये और लोगो के दिल से ये बात कैसे निकाली जाये की हिंदी बोलना, लिखना और सुनना हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है और ये हमें हर क्षेत्र में अच्छे अवसर प्रदान कर सकती है। अंग्रेजी का बढ़ता दबदबा आज अंग्रेजी को ज्ञान, प्रतिष्ठा, और रोजगार का माध्यम माना जाता है। हिंदी, चाहे जितनी समृद्ध और प्रभावशाली हो, केवल एक 'सहायक' भाषा बनकर रह गई है । सामाजिक सोच हिंदी में बात करना अक्सर 'पिछड़ेपन' की निशानी मान लिया जाता है। जबकि अंग्रेजी में गलत बोलने वाले को भी 'स्मार्ट' समझा जाता है। सरकार और संस्थानों की भूमिका, चीन और जापान जैसे देशों ने अपनी भाषाओं को प्राथमिकता दी है। उनकी शिक्षा, तकनीक, और सरकारी कामकाज मातृभाषा में होता है। लेकिन भारत में हिंदी को अभी भी द्वितीय श्रेणी का दर्जा दिया जाता है। हिंदी को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और व्यापार की भाषा बनाने की जरूरत है। ऐसा करने के लिए हमें हिंदी में रिसर्च, पब्लिकेशन और तकनीकी शब्दावली का निर्माण करना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में हिंदी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हिंदी में शिक्षण को आधुनिक और रोचक बनाया जाए। सरकार को हिंदी में सभी सरकारी कामकाज अनिवार्य करना चाहिए और इसे हर क्षेत्र में बढ़ावा देना चाहिए। हिंदी को बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। जैसे स्वदेशी अभियान ने हमारी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाया, वैसे ही हिंदी को बचाने के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन जरूरी है।
हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, हमारी पहचान है। अगर हमने समय रहते हिंदी के महत्व को नहीं समझा, तो हमारी आने वाली पीढ़ी केवल अंग्रेजी में बातें करेगी और हिंदी उनकी यादों में भी नहीं रहेगी। अब वक्त है हिंदी से डरने का नहीं, बल्कि हिंदी को गर्व से अपनाने का। आइए, मिलकर हिंदी को उसका सम्मान और स्थान वापस दिलाएं।
आइए, एक संकल्प लें: "मैं हिंदी बोलूंगा, हिंदी लिखूंगा और हिंदी में अपने विचार व्यक्त करूंगा। क्योंकि मेरी भाषा मेरी पहचान है।" "हिंदी बचाओ, संस्कृति बचाओ।"
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